रीता अदा देहलवी की मशहूर गजल

ग़ज़ल…

तमन्नाओं की बस्ती में नहीं कोई निशां मेरा
मुहब्बत मुद्दतों से ले रही है इम्तिहां मेरा

हवा के चंद झोंकों से वो तिनकों की तरह बिखरे
यहाँ कुछ लोग आएँ थे मिटाने आशियाँ मेरा

मेरी ख़्वाहिश थी मैं उसकी ज़मीं बनकर रहूँ लेकिन
नहीं मंज़ूर था उसको बने वो आसमां मेरा

गुलों की सरपरस्ती बाग़बां की मुंतज़िर क्यूँ हो
दुआओं के भरोसे चल रहा है गुलसिताँ मेरा

शिकायत ही नही बेचारगी से अब मुझे कोई
‘अदा’ आईना जब से बन गया है राज़दां मेरा

रीता ‘अदा’
(दिल्ली)

तहलका न्यूज से ब्युरो प्रमोद सिंह

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