शादी होजाने के बाद लड़की अपना शरीर तो ससुराल लेे जाती है पर रूह मायके में ही छोड़ जाती है

मिट्ठू शाह संपादक तहलका न्यूज़

शादी होने पर लड़की अपना शरीर तो साथ ले जाती है मगर रूह मायके में ही अपने कमरे की अलमारी में छोड़ जाती है। सोचकर कि ये तो मेरा घर है।

पग फेरे पर आती है तो सब कुछ पहले जैसा होता है। वही घर वही आंगन वही सीढ़ियां और वही अलमारी और उसका कमरा सब कुछ वैसा ही। अलमारी में बैठी रूह को तस्सली देती है देख तू है न मजे में। माँ-बाबा के पास भाई के प्यार से बंधी और बहन के दुलार में इस कमरे में आराम फरमाती हुई।

दूसरी बार मायके आती है। हर कोई दुलारता है। चाय के बाद अपने कमरे में जाती है तो देखती है कि उसकी रूह अलमारी से बाहर पलंग पर बैठी है। एकदम उदास। पूछने पर रूह कहती है कि अलमारी के सब कपड़े अब उसके नहीं रहे माँ ने दे दिए इधर-उधर। बाली-बुंदों से लेकर चप्पल जूतियां छोटी बहन ले ली। सूखे काजल और खत्म होने को आई गुलाबी सुर्खी को माँ ने कचरे में डाल दिया। बचे तुम्हारे सर्टिफिकेट वो एक पन्नी में डालकर रख दिये गए कि अब इनका यहां क्या काम। जब तुम आओगी तो दे देंगे तुम्हे ताकि ले जाओ इन्हें ससुराल। लड़की थोड़ा गुस्से में मगर आहिस्ता से कहती है- और मेरे सारे पोस्टर? वो तो तुम्हारी शादी की पुताई में ही हट गए थे। मगर शादी की धुन में तुम्हें कहाँ होश था।

लड़की को ऐसा लगता है कि माँ-बाबा सभी मिलकर उससे सौतेला बर्ताव कर रहे हैं। तभी पास बैठी रूह कहती है देख फिक्र न कर ये कमरा तो तेरा आज भी है। तेरी रूह का बसेरा यही है। लड़की खुश हो जाती है। आंखों को बंद करके कोहनी की दीवार माथे पर बनाकर सो जाती है। 3 दिन अच्छे गुजरते हैं। फिर रूह को कमरे में ही छोड़ चली जाती है, ससुराल।

अबकी बार 6 महीने बाद आती है। 8 घन्टे देर से आई ट्रेन ने लड़की के लिए मायके के सफर को लम्बा कर दिया होता है। घर पहुंचते ही माँ से चाय के लिए कहती है। समान उठाये अपने कमरे में जा रही होती है तभी माँ कहती है गुड़िया यही छोटे कमरे में रख ले। लड़की तुरंत कहती है क्यों? माँ-वो भइया की पढ़ाई होती है इसलिए उसे ऊपर तेरे ही कमरे में शिफ्ट कर दिया। आराम से पढ़ लेगा। लड़की वहीं सीढ़ियों पर खड़ी धक्क रह जाती है। फ़ौरन ऊपर दौड़ती हुई जाती है, अपनी रूह को तलाशने! तो देखती है कि रुआंसी आंखें लिए रूह कमरे की दहलीज पर बैठी उसका इंतजार कर रही होती है। उसे देखकर लड़की को एहसास हो जाता है कि अब उसका घर, उसका घर नहीं ‘मायका’ हो गया है। जहां अब “वो” बस मेहमान है। उसके एहसास को वक़्त ने इस घर से मिटा डाला है।

हताश लड़की अपने बैग और स्ट्रॉलर को पलंग और दीवार के बीच के हिस्से में फिट कर लेती है और 3 दिन कभी इस कमरे तो कभी उस कमरे में सोकर गुज़ार देती है। शादी के एक साल से पहले ही लड़की का “मेरे घर” का भ्रम टूट जाता है। उसे समझ आ जाता है कि लड़कियों के कोई घर नहीं होते! जाते वक्त बैग के कोने में ही रख ले जाती है अपनी रूह को।
अब लड़की ससुराल में रहती है और 3 से 4 साल में ही ‘मायके’ आती है।
… लेखक अभय कुमार सिंह

Leave a Reply

%d bloggers like this: