बलरामपुर में शहीद चन्द्र शेखर आज़ाद के जयंती पर रविन्द्र कमलापुरी ने माल्यार्पण कर शहीद को दी श्रद्धांजलि

रमवीर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद जी की जन्म जयंती पर शहीद की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते रवीन्द्र गुप्ता कमलापुरी

एकल विद्यालय अभियान द्वारा चंद्र शेखर आजाद जी के जन्म दिवस पर किया गया कार्यक्रम

समाज सेवी के लोगों ने चंद्र शेखर आजाद जी के जयंती पर आयोजित हुआ कार्यक्रम

जनपद बलरामपुर में माँ भारती के अमर सपूत और स्वाधीनता संग्राम में अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले,परमवीर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद जी की जन्म जयंती पर भगोतीगंज संतोषी माता मंदिर स्थित आजाद पार्क में पहुंचकर शहीद की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उनके पद चिन्हों पर चलते हुए समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने और समाज सेवा का संकल्प लिया अमर शहीद के जयंती के अवसर पर रवीन्द्र गुप्ता कमलापुरी युवा समाज सेवी की अगुवाई में नव युवक ने आजाद पार्क पहुंचकर शहीद की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर देश की आजादी में उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर चर्चा करते हुए कहा कि देश के लिए अपना सर्वस्व निछावर करते मां भारती के चरणो में अपना बलिदान देकर अमर हो गए आज के हम सब युवा उनके त्याग और बलिदान से प्रेरणा लेकर समाज में व्याप्त बुराइयों को जड़ से मिटाकर स्वस्थ समाज बनाने की प्रतिज्ञा लेते हैं इस दौरान आजादी की जंग में आजाद की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्हें याद किया गया जिसका खून न खौला वह खून नहीं पानी है जो देश के काम ना आए वह बेकार जवानी है जैसे वचनों से युवाओं के दिलों में राष्ट्रीयता और आजादी के लिए जोश भरने वाले वीरता और साहस के पर्याय अग्रण स्वतंत्रता सेनानी अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद जी की जयंती पर सहृदय नमन जिसमें देश की स्वाधीनता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले भारतमाता के सच्चे सपूत,शहीद ए आज़म,चंद्र शेखर आजाद जी की जयंती पर उन्हें शत्-शत् नमन करता हूँ चंद्रशेखर आजाद भारत के उन महान क्रांतिकारियों में से एक हैं जिनके नाम से अंग्रेज कांपा करते थे उनका जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य झाबुआ जिले के भाबरा गाँव में हुआ था बचपन में ही उन्होंने भील बालकों के साथ धनुष बाण चलाना सीखा,इस वजह से उनकी निशानेबाजी भी बहुत अच्छी हो गयी 14 की आयु में वे बनारस आ गए और संस्कृत पाठशाला में पढ़ने लगे, वहीं उन्होंने कानून भंग आंदोलन में सर्वप्रथम योगदान दिया था 1920-21 में वे गांधी जी के असहयोग आंदोलन से जुड़े और गिरफ्तार हुए,जब जज ने नाम पूछा तो उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वतंत्रता’ और ‘जेल’ को उनका निवास बताया,तब से वे सार्वजनिक रूप से आजाद कहलाए 1925 में उन्होंने काकोरी षड्यंत्र में सक्रिय भाग लिया और फ़रार हो गए 17 दिसंबर,1928 को उन्होंने लाल लाजपत राय की मृत्यु का बदला, लाहौर के पुलिस अधीक्षक जे.पी. साण्डर्स को गोली मार कर लिया, फिर उनके नेतृत्व में भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की केन्द्रीय असेंबली में बम धमाका किया उनके कई साथियों को मृत्युदंड की सजा हुई,जिसको कम करवाने के लिए उन्होंने अथक प्रयास किए,इसी क्रम में वे इलाहबाद में आनंद भवन में जवाहर लाल नेहरू से मिलने गये जहां से उन्हें कोई सहायता नहीं मिली आनंद भवन से निकलकर आज़ाद अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मन्त्रणा कर ही रहे थे,तभी सी.आई.डी. का एस.एस.पी.नॉट बाबर जीप से वहाँ आ पहुँचा,उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी दोनों ओर से भयंकर गोली बारी हुई आज़ाद ने संकल्प लिया था कि वे न कभी पकड़े जाएंगे और न ब्रिटिश सरकार उन्हें फांसी दे सकेगी और इसी संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने दिनांक 27 फरवरी 1931 ई. को उसी पार्क में स्वयं को गोली मारकर मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दे दी और यह दिन हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गया जिसमें चंद्र शेखर आजाद जी के जयंती पर इन सभी लोगों ने मूर्ति पर माल्यार्पण किए जिसमें डॉ विमल चंद,प्रमोद चौधरी,संतोष श्रीवास्तव,जसवंत यादव,रणेन्द्र नाथ त्रिपाठी एडवोकेट,शादाब खान यूनिक ट्रेलर,स्वामी दयाल,आदि लोग मौजूद रहे

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