सियासी दलों का चुनावी हथियार बना सोशल मीडिया चौधरी अफ़ज़ल नदीम

सियासी दलों का चुनावी हथियार बना ‘सोशल मीडिया’
नई दिल्ली-आज देश की 60 से 70 फीसदी आबादी के पास स्मार्ट और एंड्रॉयड फोन हैं, शहरों में तो तकरीबन 100 फीसदी के पास ही है। इसके अलावा तकरीबन हरेक एंड्रॉयड फ़ोन यूजर सोशल मीडिया से यानि फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर, यू-ट्यूब,इंस्टाग्राम,आदि माध्यमों से जुड़ कर उनका प्रयोग करते हुए काफ़ी समय दे रहे हैं।
जाहिर सी बात है की ये सब लोग अलग-अलग ग्रुपों से भी जुड़े हुए हैं, मसलन कोई धार्मिक ग्रुपों से जुड़ा है, कोई राजनैतिक पार्टियों से जुड़ा है, कोई सामाजिक संस्थाओं उनके सरोकारों या सामाजिक कार्यों से जुड़ा है, कोई जातिय ग्रुपों से जुड़ा है, पत्रकारिता के विजन से जुड़ा है, कोई कला की दुनिया से जुड़ा है, तो कोई जनरल ग्रुप से जुड़ा हुआ है। लेकिन हमें सबसे बड़ा और सर्वाधिक खतरा धार्मिक कट्टरवादी और राजनैतिक दलों के कट्टरवादी ग्रुपों से है। अफसोस की बात यह है कि आजकल लगभग अधिकतर राजनैतिक पार्टियों ने ही धार्मिक कट्टरवादी ग्रुप बनाए हुए हैं। धार्मिक कट्टरवाद और राजनैतिक कट्टरवाद के लिए कई पार्टियों ने बाकायदा अपनी-अपनी आईटी सेल बनाई हुई हैं, जिसके लिए करोड़ों का बजट होता है।
इन आईटी सेल का मुख्य उद्देश्य यही है कि लोगों के सामने अपनी पार्टी की खराब छवि को भी अच्छी छवि के रूप में पेश किया जाए और किसी भी तरह की बातें लिख कर लोगों में कट्टरता पैदा की जाए और अपनी पार्टी की वोट संख्या बढ़ाई जाए, बड़ी बात यह है कि इसमें ये लोग बहुत हद तक कामयाब होते भी हैं। जबकि कुछ सालों पहले तक इस प्रकार की कोई व्यवस्था नही थी। हमने वह समय भी देखा है।
जब चुनावों के समय सरकारी समाचार चैनल दूरदर्शन पर सभी राजनीतिक दलों को उनके संख्याबल के आधार पर समय निर्धारित किया जाता था। उसके बाद 21वीं सदी में प्रवेश करने के साथ तो निजी टीवी और समाचार चैनलों की बाढ़ सी आ गई और राजनीतिक पार्टियों में चैनलों के माध्यम से प्रचार करने की जबरदस्त प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई।
हालांकि अब देखने वाली बात यह है कि कट्टरता के नाम पर क्या परोसा जा रहा है? क्या धार्मिक रूप से लोगों की भावनाओं को भड़काया जा रहा है? क्या देश के आगे बढ़ने के लिए उपयोगी मुख्य मुद्दे या उन सभी से ध्यान भटकाकर नागरिकों को एक करने की जगह धर्म के नाम पर लोगों को घृणा करना सिखाया जा रहा है?
क्या जातियों को आपस में भिड़वाकर ऊंच-नीच का भेद बढ़ाया जा रहा है? क्या ये लोग किसी वर्ग विशेष की पैरवी या बदनामी करके आखिर वोट के लिए करते हैं? शायद हां, तो फिर ये लोग और इनके सियासी मालिक कैसे देश का निर्माण करना चाहते हैं?एवं कर सकते हैं?यह बहुत बड़ी सवाल है।जनता भी इनकी हां में हां मिलाते हुए वही संदेश कॉपी पेस्ट करके आगे से आगे सरका देती है, बिना यह जाने की वे तथ्यों के बिना जो कॉपी पेस्ट कर रहे हैं, उसका परिणाम क्या निकलेगा?
लेकिन ये लोग तो अपनी सियासी रोटियां सेक रहे हैं, पर सवाल यह उठता है कि क्या देशवासियों द्वारा एक पार्टी का पक्ष रखने के लिए आपसी भाईचारे, सद्भावना और प्रेम,मोहब्बत को बलि चढ़ाना उचित है? हमने देखा है कि राजनीतिक पार्टियों के इन संदेशों को अंधभक्त बनकर उसके ग्रुप से जुड़ा हुआ व्यक्ति आगे प्रेषित कर देता है और अपने भाई तक से आपसी संबंधों में जाने-अनजाने खटास पैदा कर लेता है। मैं आपसे पूछता हूँ कि क्या यह सही है? इससे किसका क्या भला होगा? आप यह ऊंट-पटांग और आग लगाने वाले संदेश भेजकर क्या जतलाना चाह रहे हैं एवं बताना चाह रहें हैं?
क्या आप यह जानते भी हैं कि आपने क्या खो दिया है? इतने महत्वपूर्ण संबंध, जो भाई भाई के काम आता है, आज आपके इन नफरत भरे संदेशों से आपसे चिढ़ने लग गया है, आपसे टूट कर दूर हो चुका है। शायद आप अपनी आत्मा से ऐसा कभी नहीं चाहते थे, मगर आंख मिर्च कर संदेश भेजने की आदत ने सब मटियामेट कर दिया। असामाजिक तत्व लोगों की हत्याएं करने लगे हैं, जब मर्जी जहां मर्जी उपद्रव करने लगते हैं।
जब मन हो सड़क पर उतर आते हैं और किसी को भी पीट-पाटकर चले जाते हैं और कई बार हत्या तक कर डालते हैं। ऐसे जघन्य अपराध करने वालों को आखिर किसकी शह मिली होती है कि उन्हें पुलिस भी नहीं पकड़ती और अगर किसी दबाव में पकड़ भी लेती है, तो जेल होने से पहले ही उन्हें जमानत मिल जाती है। यही वजह है कि ऐसे लोग, जिनमें अमूमन युवा ही होते हैं कदाचित डरते नहीं हैं और खुलेआम सड़कों तक पर अपराध कर बैठते हैं। इसका उदाहरण आपलोगों के सामने है जो देश में हो रहा है।यहाँ तक कि कुछ राज्य शीर्ष पे हैं दिन-दहाड़े यह मामले में।
पुलिस प्रशासन के लाचार होने और राजनीतिक सपोर्ट होने के चलते ऐसे युवा बेखौफ वारदातों को अंजाम देते रहते हैं। ऐसे अपरिपक्व युवाओं की कुछ राजनीतिक दलों को हमेशा जरूरत रहती है और ये दल इन नौजवानों का जमकर समय समय पर गलत इस्तेमाल करते हैं और उन्हें पूर्ण संरक्षण देने का अंदर ही अंदर वादा करते रहते हैं। लेकिन इन युवाओं का कैरियर सत्ता परिवर्तन के हिसाब से राजनीतिक इस्तेमाल की भेंट चढ़ते-चढ़ते एक दिन चौपट हो जाता है और उन्हें पता ही नहीं चल पाता कि वे कब बर्बाद हो गए। ऐसे में इन युवाओं में से अधिकतर मर्डर, अपहरण,चोरी, लूट, जेबकतरी और नशे जैसे धंधे में उतर जाते हैं।
मैं ऐसे युवाओं को आगाह करते हुए कहना चाहता हूं कि अभी भी समय है अपनी आंखें खोलकर और खुद के साथ-साथ देश में चल रहे सदियों पुराने सामाजिक ताने बाने को हानि न पहुंचाऐं। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि जो बात आपको अच्छी लगे, वह दूसरे भाई बहन को भी अच्छी लगे, क्योंकि हर जगह की परिस्थितियां एक जैसी नहीं होती। समझदारी का प्रयोग करें एक बंदर की तरह नकल करने की आदत छोड़ें, अपनी बुद्धि,विवेक का इस्तेमाल करें एवं लगाये। क्या सही है और क्या गलत इसको समझें।
भारत का संविधान पढ़ें, जिसमें सब एक समान हैं। सबको एक साथ रहने की आजादी देता है। मैं आपसे पूछता हूँ कि अगर कोई गलत भी है, तो क्या आप उन सबके लिए अलग देश बना सकते हैं या देश से बाहर निकाल सकते हैं? गलत है, तो भारत में उसको भुगतने के लिए कानून भी है, उस पर ही भरोसा कर लें। मेरा आपसे विनम्र निवेदन यही है कि अब से आप किसी के पिछलग्गू न बनें, न ही किसी का अंधाधुंध अनुसरण करें। जो हम सबके लिए ठीक हो, वही बात आगे प्रेषित करें।
याद रखिए राजनीतिक दलों में कोई भी आपका सगा नहीं है, जो आपका निजी रूप से भला कर देगा। अब तक मैंने किसी भी सियासी दल का नाम नहीं लिया है, लेकिन जब भी जिस दल का दांव लगता है। वह अपनी कारस्तानी में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ता, इस हमाम में सभी नंगे हैं। लेकिन आशा है अब आप अपने पूरे होशोहवास से कॉपी पेस्ट करने की आदत की लाचारी से बचेंगे और अपनी खुद की अक्ल का इस्तेमाल कर अपने सामाजिक ताने-बाने और भाईचारे को मजबूत करने न कि उसको खत्म करने का कार्य करेंगे। चौधरी अफ़ज़ल नदीम की रिपोर्ट TAHALKANEWS OFFICE CON NO 9198041777

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