सरकारी नियम: फायदा किसे? आम आदमी को या बिचौलियों और प्रभावशाली वर्ग को?
भारत के समाज सेवक, लेखक एवं समाजशास्त्री इरफान जामियावाला का सरकार से सवाल
भारत में सरकार समय-समय पर ऐसे अनेक कानून और योजनाएँ बनाती है जिनका उद्देश्य आम नागरिक, गरीब, किसान, छात्र, मज़दूर और वंचित समाज का विकास बताया जाता है। लेकिन ज़मीन पर अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या इन नियमों का वास्तविक लाभ उन्हीं लोगों तक पहुँचता है जिनके लिए ये बनाए गए थे, या फिर उनका बड़ा हिस्सा बिचौलियों, प्रभावशाली संस्थानों और आर्थिक रूप से मजबूत वर्ग के पास चला जाता है?
- शिक्षा: सेवा या व्यापार?
भारत के न्यायालयों ने कई बार स्पष्ट किया है कि शिक्षा लाभ कमाने का व्यवसाय नहीं हो सकती। निजी शिक्षण संस्थानों को “उचित अधिशेष” (reasonable surplus) रखने की अनुमति है, लेकिन “मुनाफाखोरी” (profiteering) और कैपिटेशन फीस स्वीकार्य नहीं है। ?
फिर भी व्यवहार में कई जगह देखने को मिलता है कि:
भारी-भरकम प्रवेश शुल्क,
अनिवार्य यूनिफॉर्म और किताबों की खरीद,
परिवहन एवं अन्य शुल्क,
कोचिंग और निजी ट्यूशन का दबाव,
शिक्षा को आम परिवारों के लिए अत्यंत महँगा बना देते हैं। इसका प्रभाव निम्न एवं मध्यम आय वर्ग पर सबसे अधिक पड़ता है। - CSR फंड: समाज के लिए या चुनिंदा संस्थाओं के लिए?
CSR का उद्देश्य यह है कि पात्र कंपनियाँ अपने औसत शुद्ध लाभ का कम से कम 2% सामाजिक कार्यों पर खर्च करें। यह प्रावधान 2013 के कंपनी कानून की धारा 135 के अंतर्गत आया। ?
लेकिन कई शोध और विश्लेषण कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियाँ बताते हैं:
बड़ी कंपनियाँ अक्सर उन्हीं बड़े एनजीओ या संस्थानों के साथ काम करती हैं जिनकी प्रशासनिक क्षमता पहले से मजबूत होती है।
छोटे, ग्रामीण और जमीनी संगठनों तक CSR फंड सीमित मात्रा में पहुँचता है।
शिक्षा और स्वास्थ्य पर अधिक खर्च होता है, जबकि कई पिछड़े क्षेत्र और हाशिए के समुदाय अपेक्षाकृत कम संसाधन प्राप्त करते हैं। ?
यह कहना कि “सारा CSR केवल अमीरों को जाता है” तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा, क्योंकि अनेक कंपनियाँ वास्तविक सामाजिक परियोजनाएँ भी चलाती हैं। लेकिन फंड के वितरण में असमानता और पारदर्शिता को लेकर गंभीर बहस अवश्य मौजूद है। ? - नियम अच्छे, क्रियान्वयन कमजोर
भारत में कई कल्याणकारी कानून मौजूद हैं, लेकिन चुनौतियाँ अक्सर इनके क्रियान्वयन में दिखाई देती हैं:
जटिल आवेदन प्रक्रियाएँ,
दस्तावेज़ों की कठिन माँग,
बिचौलियों की भूमिका,
सूचना का अभाव,
और स्थानीय स्तर पर जवाबदेही की कमी।
इन कारणों से पात्र लाभार्थी कई बार योजनाओं का पूरा लाभ नहीं उठा पाते। - क्या सुधार संभव हैं?
यदि सरकार वास्तव में आम नागरिक तक लाभ पहुँचाना चाहती है, तो कुछ कदम प्रभावी हो सकते हैं:
CSR परियोजनाओं की सार्वजनिक और पारदर्शी निगरानी।
छोटे एवं जमीनी संगठनों को भी अवसर।
शिक्षा संस्थानों की फीस और शुल्क पर प्रभावी नियमन।
सरकारी योजनाओं में डिजिटल पारदर्शिता और सामाजिक ऑडिट।
बिचौलियों की भूमिका कम करने के लिए सरल और प्रत्यक्ष प्रक्रियाएँ।
निष्कर्ष
सरकार द्वारा बनाए गए नियमों का उद्देश्य सामान्यतः जनहित होता है, लेकिन किसी भी कानून की सफलता उसके ईमानदार और पारदर्शी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। यह कहना उचित होगा कि भारत में कई क्षेत्रों में नियम और उनकी वास्तविक ज़मीनी स्थिति के बीच अंतर दिखाई देता है। इसलिए आवश्यकता नए कानूनों से अधिक, मौजूदा कानूनों के निष्पक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह क्रियान्वयन की है।
लेख (विचारात्मक), समाजशास्त्रीय विमर्श हेतु
इरफान जामियावाला
समाज सेवक | लेखक | समाजशास्त्री
