सामाजिक चेतना और प्रतिनिधित्व की तलाश
गोवंडी की गलियों में आज एक अलग ही बेचैनी थी यह बेचैनी सत्ता पाने की नहीं, बल्कि अपनी आवाज़ को पहचाने जाने की थी। भारत और महाराष्ट्र में पसमांदा समाज की लगातार अनदेखी के बीच, समाजसेवक, लेखक और निर्देशक इरफान जामियावाला की मौजूदगी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया कि आख़िर लोकतंत्र में सबसे कम सुनी जाने वाली आवाज़ें ही सबसे ज़्यादा संख्या में क्यों हैं।
कार्यक्रम का उद्देश्य सिर्फ पसमांदा मुसलमानों के प्रत्याशी को सपोर्ट करना था, व सामाजिक चेतना का संचार था। इरफान जामियावाला ने अपने साथियों और संस्था के सदस्यों के साथ मिलकर अपने समाज के अख्तर कुरैशी व उनकी बहु समीरा अनस कुरैशी को सपोर्ट कर दिया, और अपने समाज में यह संदेश रखा कि पसमांदा मुसलमान केवल “वोट बैंक” नहीं हैं, बल्कि बराबरी के हक़दार नागरिक हैं। उन्होंने भावनात्मक अंदाज़ में बताया कि दशकों से अल्पसंख्यकों, विशेषकर पसमांदा समाज, को बड़े-बड़े वादों के सहारे उम्मीदें दिखाई जाती रहीं, लेकिन शिक्षा, रोज़गार और प्रतिनिधित्व के सवाल आज भी वहीं खड़े हैं।
गोवंडी में समीरा अनस कुरेशी सहित अन्य सामाजिक रूप से सक्रिय प्रत्याशियों के समर्थन में जुटे लोग इस बात पर एकमत दिखे कि नेतृत्व वही सार्थक है जो ज़मीन से जुड़ा हो जो गलियों की तकलीफ़ समझे, घरों की मजबूरी जाने और समाज के सबसे कमज़ोर तबके की बात बिना डर के रख सके। इरफान जामियावाला ने यह भी रेखांकित किया कि जब तक समाज खुद सवाल नहीं पूछेगा, तब तक जवाब देने की ज़हमत कोई नहीं उठाएगा।
यह संवाद किसी पार्टी के खिलाफ़ नहीं, बल्कि एक सोच के खिलाफ़ था वह सोच जो वर्षों से हाशिये के समाज को धैर्य रखने की सलाह देती आई है। वक्ताओं ने कहा कि अब समय आ गया है कि मुसलमान और तमाम अल्पसंख्यक अपने भीतर झाँकें, शिक्षा को प्राथमिकता दें, संगठन को मज़बूत करें और ऐसे नेतृत्व को आगे लाएँ जो सिर्फ़ चुनाव के मौसम में नहीं, बल्कि हर मौसम में साथ खड़ा दिखे।
गोवंडी का यह आयोजन एक याद दिलाता हुआ पल था कि लोकतंत्र केवल मतपत्र से नहीं, जागरूक नागरिकता से मज़बूत होता है। और जब पसमांदा समाज अपनी कहानी खुद लिखने के लिए आगे बढ़ता है, तो यह सिर्फ़ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आने वाले बदलाव की आहट बन जाता . .

