प्रोफेसर नदीम अहमद और प्रोफेसर काज़िम से रिसर्च स्कॉलर रियाज़ शफ़ीक की मुलाक़ात

प्रोफेसर नदीम अहमद और प्रोफेसर काज़िम से रिसर्च स्कॉलर रियाज़ शफ़ीक की मुलाक़ात

“गहरा मुतालआ ही मज़बूत फ़िक्र को जन्म देता है” – प्रोफेसर काज़िम

“जब तक ज़बान से मोहब्बत नहीं होगी, अदब ज़िंदा नहीं रह सकता” – प्रोफेसर नदीम

मधुबनी संवाददाता मो सालिम आजाद

उर्दू अदब की तारीख़ ऐसे दरख़्शां और ताबिंदह नामों से भरी पड़ी है, जिन्होंने न सिर्फ़ ज़बान-ओ-अदब की आबयारी की बल्कि आने वाली नस्लों को फ़िक्री रहनुमाई भी अता की। इन्हीं रोशन सितारों में दो अहम और मोअतबर नाम प्रोफेसर नदीम अहमद और प्रोफेसर काज़िम साहब के हैं। हाल ही में इन दोनों जदीद अहले-इल्म-ओ-अदब से हुई आमने-सामने मुलाक़ात एक यादगार और नाक़ाबिले-फ़रामोश तजुर्बा साबित हुई।
नई नस्ल के नौजवान क़लमकार और ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी, दरभंगा (बिहार) के रिसर्च स्कॉलर रियाज़ अख्तर शफ़ीक ने नामानिगार को बताया कि यह मुलाक़ात महज़ एक रस्मी बैठक नहीं थी, बल्कि उर्दू ज़बान-ओ-अदब के माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल पर एक संजीदा, फ़िक्री और बामानी मुकालमा था। गुफ़्तगू की इब्तिदा उर्दू ज़बान के उरूज से हुई।
इस मौक़े पर प्रोफेसर नदीम अहमद ने दर्द-भरे लहजे में उस दौर को याद किया जब उर्दू सिर्फ़ एक ज़बान नहीं बल्कि तहज़ीब, शाइस्तगी और मुश्तरका तहज़ीब की अलामत समझी जाती थी। उन्होंने कहा कि एक ज़माना था जब उर्दू महफ़िलों, दरसगाहों और घरों की ज़ीनत हुआ करती थी, मगर बदलते वक़्त के साथ इसकी समाजी हैसियत को कई चैलेंजों का सामना करना पड़ा।
गुफ़्तगू को आगे बढ़ाते हुए प्रोफेसर काज़िम साहब ने उर्दू अदब के ज़वाल के असबाब पर रोशनी डाली। उनके मुताबिक़ नई नस्ल का मुतालआ से दूर होना, मादरी ज़बानों से बेरुख़ी और महज़ मआशी फ़ायदे को इल्म का मयार समझना उर्दू ज़बान-ओ-अदब के लिए नुक़सानदेह साबित हुआ है। हालांकि उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि उर्दू अदब में आज भी इतनी फ़िक्री तवानाई मौजूद है कि अगर संजीदा और मुख़्लिसाना कोशिशें की जाएँ तो इसका खोया हुआ मुक़ाम दोबारा हासिल किया जा सकता है।
इस मुलाक़ात के दौरान दोनों मुअज़्ज़िज़ प्रोफेसरों ने शफ़क़त और ख़ुलूस के साथ नसीहत-आमेज़ बातें भी कहीं, जो ख़ास तौर पर स्टूडेंट्स, रिसर्च स्कॉलर्स और नौआमोज़ क़लमकारों के लिए मशअले-राह हैं।
प्रोफेसर नदीम अहमद ने फ़रमाया:
“उर्दू को महज़ एक सब्जेक्ट न समझें, बल्कि अपनी पहचान समझें, क्योंकि जब तक ज़बान से मोहब्बत नहीं होगी, अदब ज़िंदा नहीं रह सकता।”
वहीं प्रोफेसर काज़िम साहब ने मुतालआ की अहमियत पर ज़ोर देते हुए कहा:
“ज़्यादा लिखने से पहले ज़्यादा पढ़ो, क्योंकि गहरा मुतालआ ही मज़बूत फ़िक्र को जन्म देता है।”
यह इल्मी-ओ-अदबी बैठक उस वक़्त और ज़्यादा बामानी हो गई जब यह बात सामने आई कि इस मुलाक़ात को मुमकिन बनाने का सेहरा प्रोफेसर आफ़ताब अशरफ़ के सर जाता है। उनकी दिलचस्पी और कोशिशों ने न सिर्फ़ दो अज़ीम असातिज़ा-ए-अदब को एक जगह जमा किया, बल्कि अदब-दोस्त अफ़राद को उनके ख़यालात से फ़ैज़याब होने का मौक़ा भी फ़राहम किया।
आख़िर में शरकाए-निशस्त ने दिल की गहराइयों से प्रोफेसर आफ़ताब अशरफ़ का शुक्रिया अदा किया और इस उम्मीद का इज़हार किया कि ऐसी इल्मी-ओ-अदबी बैठकों का एहतिमाम उर्दू ज़बान-ओ-अदब के फ़रोग़ के लिए निहायत ज़रूरी है। बेशक, ऐसी ही मुलाक़ातें आने वाले वक़्त में उर्दू के उरूज की मज़बूत बुनियाद साबित होंगी।

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