बज़्म-ए-सुख़नवरान महुआ-वैशाली की 92वीं शायरी व अदबी नशिस्त संपन्न, शायरों ने पेश किया बेहतरीन कलाम।

बज़्म-ए-सुख़नवरान महुआ-वैशाली की 92वीं शायरी व अदबी नशिस्त संपन्न, शायरों ने पेश किया बेहतरीन कलाम।

आदिल शाहपुरी
हाजीपुर वैशाली।बज़्म-ए-सुख़नवरान इंटरनेशनल महुआ (वैशाली) की 92वीं शायरी व अदबी नशिस्त रविवार, 15 फरवरी को प्रोफेसर तौक़ीर सैफ़ी के आवास पर साहित्यिक गरिमा और उत्साहपूर्ण माहौल में आयोजित की गई। कार्यक्रम में क्षेत्र के वरिष्ठ शायरों ने अपनी रचनाओं का पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
मुशायरे की शुरुआत स्वागत वक्तव्य से हुई, जिसके बाद शायरों ने एक-से-एक बेहतरीन अशआर सुनाकर साहित्यिक महफिल को यादगार बना दिया। वरिष्ठ शायर जनाब हनीफ अख़्तर ने सामूहिक प्रयास और एकता पर आधारित शेर पढ़ते हुए कहा—
“चलो मिलकर उतारें चाँद सूरज, अकेले हमने तो कोशिश बहुत की।”

जनाब क़ासिम हिदायतपुरी ने इतिहास और सभ्यता की पीड़ा को स्वर देते हुए कहा—
“अब तक संभल सके न संभलने की फ़िक्र की, अन्दलुस में ज़ख़्म उठाए ज़माने गुज़र गए।”

जनाब तुफ़ैल अहमद ख़ाक़ी ने प्रेम और सौंदर्य के भाव से सजी रचना प्रस्तुत करते हुए कहा—
“तुम्हारे इस रुख़-ए-रौशन से मातम आसमां पर है, लगे बुझने वहाँ शम्स व क़मर आहिस्ता-आहिस्ता।”

जनाब नाज़िम क़ादरी ने प्रकृति और संवेदनाओं पर आधारित शेर पढ़ा—
“इन फफोलों से ये मालूम हुआ, हाथ शबनम से भी जल जाते हैं।”

प्रोफेसर तौक़ीर सैफ़ी ने समाज में बढ़ती नफ़रत और विभाजन पर कटाक्ष करते हुए कहा—
“बीच आंगन में कई ऊँची फ़सील, बुग़्ज़ व नफ़रत से उठा करती है।”

जनाब क़मर शाहदी ने सामाजिक यथार्थ को दर्शाते हुए कहा—
“सूरज के मुक़ाबिल है चराग़ों का जलाना, कुछ भी हो मगर क़ाबिल-ए-तदबीर नहीं है।”

जनाब बशर रहीमी ने विश्वासघात की पीड़ा को शब्दों में ढालते हुए कहा—
“कैसे कर लूँ मैं भला उस पर भरोसा लोगों, जिसके चेहरे पर है इक दूसरा चेहरा लोगों।”

जनाब शहाबुद्दीन राग़िब ने भाषा और मानवीय भावनाओं पर आधारित रचना प्रस्तुत करते हुए कहा—
“वो ज़बाँ में असर चाहिए, शादमां हर बशर चाहिए।”

डॉ. इज़हारुल हक़ ‘अज़हर’ ने सामाजिक परिस्थितियों पर कटाक्ष करते हुए कहा—
“बात अच्छे दिनों की करते हैं, रात अच्छी कहाँ कभी आई।”

अंत में जनाब आदिल शाहपुरी ने सामाजिक बदलाव और नेतृत्व पर आधारित शेर पढ़ते हुए कहा—
“लाए थे इंक़लाब वो जाने कहाँ गए, मिल्लत के जो कहीं न कहीं तरजुमान थे।”

इस साहित्यिक नशिस्त की अध्यक्षता वरिष्ठ और केनहामशक़ शायर जनाब हनीफ अख़्तर ने की, जबकि संचालन की जिम्मेदारी लोकप्रिय शायर जनाब आदिल शाहपुरी ने निभाई। कार्यक्रम का समापन अध्यक्षीय भाषण और बज़्म के पत्रकार सदस्य डॉ. मोहम्मद कलीम अशरफ़ द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
इस अवसर पर साहित्य प्रेमियों, बुद्धिजीवियों और स्थानीय गणमान्य नागरिकों की बड़ी संख्या में उपस्थिति रही। कार्यक्रम ने उर्दू साहित्य और शायरी की परंपरा को आगे बढ़ाने के साथ-साथ नई पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने का संदेश दिया।

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