राज्यसभा में मुसलमानों की अनदेखी: क्या यह लोकतंत्र के साथ अन्याय नहीं?

राज्यसभा में मुसलमानों की अनदेखी: क्या यह लोकतंत्र के साथ अन्याय नहीं?
लेखक: इरफान जामियावाला
(समाज सेवक, लेखक, पत्रकार और पसमांदा चिंतक)
भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। हमारे संविधान ने सभी नागरिकों को समान अधिकार, समान अवसर और बराबरी का दर्जा दिया है। लेकिन जब देश की संसद में प्रतिनिधित्व की बात आती है तो कई बार यह आदर्श केवल कागज़ों तक ही सीमित दिखाई देता है। हाल ही में 10 राज्यों में राज्यसभा की 37 सीटों के चुनाव ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है—क्या भारतीय लोकतंत्र में मुसलमानों की भागीदारी धीरे-धीरे समाप्त की जा रही है?
इन 37 सीटों पर जिन नेताओं को भेजा गया, उनमें एक भी मुस्लिम समाज सेवक, लेखक, पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता को स्थान नहीं दिया गया। यह केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि लोकतंत्र की समावेशी भावना के लिए भी एक चिंता का विषय है।
भारत में मुसलमानों की आबादी लगभग 20 प्रतिशत के आसपास है। इतने बड़े समुदाय का संसद के उच्च सदन में प्रतिनिधित्व न होना केवल एक संयोग नहीं माना जा सकता। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि समाज के हर वर्ग की आवाज़ सत्ता के केंद्र तक पहुंचे। लेकिन जब लगातार ऐसे फैसले सामने आते हैं जिनमें किसी समुदाय को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, तो यह लोकतंत्र की आत्मा पर चोट जैसा लगता है।
राज्यसभा को हमेशा से देश के बुद्धिजीवियों, समाज सेवकों, लेखकों और अनुभवी लोगों का सदन माना गया है। यहां ऐसे लोगों को भेजा जाता है जो समाज की विविध समस्याओं और विचारों को राष्ट्रीय स्तर पर रख सकें। लेकिन जब 37 सीटों में से एक भी सीट किसी मुस्लिम समाजसेवी या बुद्धिजीवी को नहीं मिलती, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर देश के 20 प्रतिशत नागरिकों की आवाज़ कौन उठाएगा?
पसमांदा चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता इरफान जामियावाला का मानना है कि यह स्थिति केवल मुसलमानों की अनदेखी नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र की समावेशी व्यवस्था पर भी सवाल है। उनका कहना है कि संसद में समाज के हर वर्ग के लोग होने चाहिए—दलित, आदिवासी, पिछड़े, महिलाएं और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग। तभी लोकतंत्र संतुलित और मजबूत बन सकता है।
आज भारत में पसमांदा मुसलमानों की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। पसमांदा समाज जो मुस्लिम समाज का बड़ा हिस्सा है, वह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तीनों स्तरों पर पिछड़ा हुआ है। यदि राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी उनसे छीन लिया जाए, तो उनकी समस्याएं और भी हाशिए पर चली जाती हैं।
इतिहास बताता है कि जब किसी भी समुदाय को प्रतिनिधित्व से दूर रखा जाता है, तो उसके मुद्दे धीरे-धीरे राजनीतिक एजेंडा से गायब हो जाते हैं। यही कारण है कि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। संविधान सभा के नेताओं ने भी इस बात पर जोर दिया था कि भारत की संसद में देश की विविधता दिखाई देनी चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि देश की सभी राजनीतिक पार्टियां आत्ममंथन करें। उन्हें यह सोचना होगा कि क्या वे सच में लोकतंत्र के उस आदर्श को निभा रही हैं जिसमें सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित हो। यदि देश के 20 प्रतिशत नागरिकों को लगातार प्रतिनिधित्व से दूर रखा जाएगा, तो यह केवल एक समुदाय का नहीं बल्कि लोकतंत्र का भी नुकसान होगा।
इरफान जामियावाला का यह सवाल किसी एक दल या सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र से है। उनका कहना है कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब हर समुदाय को समान सम्मान और समान अवसर मिलेगा। संसद केवल सत्ता का मंच नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग की आवाज़ का प्रतीक है।
यदि भारत को वास्तव में दुनिया का सबसे मजबूत लोकतंत्र बनाना है, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि संसद में देश की सामाजिक और धार्मिक विविधता का सही प्रतिनिधित्व हो। क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत यही है!

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