कल हाजीपुर के एक हाल में कला, स्मृति और संवेदना का अद्भुत संगम देखने को मिला।
बिहार के “सेक्सपीयर” कहे जाने वाले महान लोकनाटककार भिखारी ठाकुर की जयंती के अवसर पर पूरा माहौल श्रद्धा, विचार और रंगकर्म की जीवंत ऊर्जा से भर उठा।
कार्यक्रम की शुरुआत मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के लेखक-निर्देशक व रंगकर्मी इरफान जामियावाला द्वारा दीप प्रज्वलन से हुई। टिमटिमाते दीप की लौ जैसे भिखारी ठाकुर की उस मशाल को फिर से जला रही थी, जिसने कभी समाज की कुरीतियों, शोषण और अन्याय के अंधेरे में चेतना की रोशनी फैलाई थी। इरफान जामियावाला ने भिखारी ठाकुर को याद करते हुए कहा कि उनका रंगकर्म सिर्फ मनोरंजन नहीं था, बल्कि समाज को आईना दिखाने का साहसिक प्रयास था—एक ऐसा प्रयास जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
इस अवसर पर हाजीपुर के प्रसिद्ध रंगकर्मी क्षितिज प्रकाश की नई प्रस्तुति ने दर्शकों को भीतर तक झकझोर दिया। महान लेखक चेखव की कहानी को रूपांतरित कर, उसे आज के दौर के भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से जोड़ना केवल एक नाट्य प्रयोग नहीं था, बल्कि वर्तमान व्यवस्था पर एक तीखा सवाल था। मंच पर उतरती हर पंक्ति, हर संवाद मानो आम आदमी के दर्द की आवाज़ बनकर गूंज रहा था।
हाल खचाखच भरा हुआ था। दर्शकों की आंखों में कहीं आक्रोश था, कहीं पीड़ा, तो कहीं बदलाव की उम्मीद। तालियों की गूंज सिर्फ कलाकारों के अभिनय के लिए नहीं थी, बल्कि उस सच्चाई के लिए थी जिसे मंच से बेखौफ होकर कहा जा रहा था।
यह शाम सिर्फ भिखारी ठाकुर की जयंती नहीं थी, यह उनके विचारों को दोबारा जीने का अवसर था। यह याद दिलाने का क्षण था कि जब तक समाज में अन्याय, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार रहेगा, तब तक भिखारी ठाकुर जैसे कलाकारों की जरूरत बनी रहेगी। हाजीपुर की यह सांस्कृतिक संध्या साबित कर गई कि रंगमंच आज भी ज़िंदा है—और समाज की नब्ज़ पर हाथ रखे हुए है।

